क्रांति

क्रांति

तुम हो इनके अधीन !

तुम्हें क्या लगा-
ये काँटों के बाड़े इन्हें रोक पाएँगे ?
ये हथियार तुम्हारे इन्हें डरायेंगे ?
इनपर ये ज़ुल्म इन्हें तडपाएँगे ?
इनकी ये चीखें दूसरों को रोकेंगे ?

कितने गलत हो तुम-
अरे, क्रांति तो मन से होता है,
शरीर तो मात्र एक जरिया है.
और कष्ट तो क्रांति की जननी है,
तुम बांधो जितना, उतनी ये फैलनी है.

क्या पाया है तुमने-
ख़ुद से क्या तुम आँख मिला पाए हो ?
कभी रातों में चैन की नींद सोये हो?
जो हैवानियत का मुखौटा पहना है तुमने,
उसके अन्दर के इंसान को क्या भूल पाए हो?

किस भ्रम में हो तुम-
इनका दमन तुम्हारा शासन नहीं,
सिर्फ ये लोग क्रांति नहीं, न क्रांति केवल इनसे.
जब भी मन को कैदने के बाड़े बना लेना,
तब अपनी रातों की नींद इनसे छुड़ा लेना.

 

My thoughts above were triggered after reading about the Communist regime tyrants begging pardon after-the-fact. They plead,’We didn’t know! We were deceived! We were true believers! Deep in our hearts we are innocent!’ One is forced to brood, whether a man is innocent just because claims his mind was contorted, coerced into devilry.  (Reading Milan Kundera’s ‘The Unbearable Lightness of Being’)

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