कल्पना

आकाश-

मेघहीन, निरंतर नील असीमता ।

मानो, एक कलाकार की अनछुई कैनवास ।

 

समंदर-

अनंत, अचल नील अस्थिरता ।

मानो, एक प्राचीन बूढ़े का चंचल बचपन ।

 

और मैं-

उलझा पड़ा रहा इस सोच में-

कौन है किसकी परछाई?

पत्थर पर लेटे जब मैं दूर देखता हूँ-

क्षितिज में कोई सीमारेखा नहीं, कोई विराम नहीं।

कौन शुरू कहाँ, किसका अंत कहाँ, किसीको ज्ञान नहीं।

 

अचानक नमकीन बूँदों की छींटे लिए एक लहर आई-

पत्थर से टकराई, टूटी, बिखरी, पर फिर जुड़ी, मुड़ी और वापस चली।

मैंने पूछा पीछे से, जवाब की आशा किये बिना- अपनी शंका का समाधान।

 

* * *

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लहर-

अस्तित्व-विहीनता से जन्मित अविराम कोलाहल ।

जैसे, निरंतर अशांति का तुच्छ अभिशाप प्राप्त हो उसे।

सूरज-

प्राण पालने वाला, अक्षय उर्जापूर्ण आग़ का गोला।

जैसे, निरंतर नियमित चलने का अर्थहीन शौक हो उसे।

 

और मैं-

विस्मित उठ खड़ा हुआ इस कल्पना में –

कि जवाब साथ लिए उत्सुक, फिर से मुड़ी वह लहर,

कि सूरज के चमक से उज्जवल, फिर से बढ़ी वह लहर।

वह आई, टकराई, टूटी, बिखरी, पर जुड़ने से पहले-

निराकार, तितर-बितर होकर, लहर मुझसे बोली-

 

जिसकी परिसीमा न दिखे, वह सीमित तो नहीं।

जिसका अर्थ तुम्हें पता नहीं, वह व्यर्थ तो नहीं।

और जो तुम्हारी कल्पना में है, वह झूठ तो नहीं।

 

 

(Cinque Terre, Italy)

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